Hichkichahat

हे यार! क्यों हिचकिचाहट है,
सीधी राह पर चलने से।
मंजिलें नहि मिला करती,
रास्ते बदलने से।।

हे यार! क्यों_ _ _ _ _ _ _ _
जो भी रंग है तेरा,
बस ये ही सच्चाई है।
चेहरे कहाँ निखरते हैं,
मुंह पे खाक मलने से।।

हे यार! क्यों_ _ _ _ _ _ _ _
तेज धूप मे आई,
ऐसी लहर एक सर्दी की।
कि मोम का हर एक पुतला,
बच गया पिघलने से।।

हे यार! क्यों_ _ _ _ _ _ _ _
आप अपने गुनाहों का,
बन गए साबूत आखिर।
हाथ जो सुगंधित थे,
फ़ूलों को मसलने से।।

हे यार! क्यों_ _ _ _ _ _ _ _






© Viney Pushkarna

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