April 8, 2011

Ashq Jo Aankho Se Beh Aae

 
दो सख्श बन् बैठा हूँ मैं आज कल,
एक जगता है तो एक सोता है, एक हस्ता है तो एक रोता है |
क्या होता है ऐसा प्यार की राह पर चलते चलते,
मैं जिस तरफ़ देखूं विनय, चेहरा उसका उस तरफ़ होता है ||

यूं हुई दास्ताँ आज, अप्रैल की रात को,
जाने कियों सह पाया, छोटी सी बात को |
कौन जाने यादों ने छेड दिया था कैसे जज़्बात को,
थीं आखें तरस उठीं उनसे मुलाकात को ||
मुलाकात के लिए खुदा जज्बाते दिल बनाये,
माफ करना की आज अश्क जो आँखों से बह आये |
लाख समझाया इस दिल मरजाने को,
पर समझे मन काफिर, इस दीवाने को |
कहता कियों बन पागल छाने इन राहों को,
संभल ज़रा पता चले इस ज़माने को ||
जो सूखे लब थे गीले आज इस ज़माने ने कराए,
माफ करना की आज अश्क जो आँखों से बह आये |
खुदी को दो सख्श बना बैठा हूँ मैं आज कल,
खुद से करता हूँ मैं बातें दिन रात हर पल |
खेला कल खुशी में नाम तेरा ले कर के मैं,
जो हारा जा मुकाम पर तो हुए मेरे जज़्बात कतल ||
हारा मैं हूँ तो मुकाम तेरे नाम पर कियों लगाएं,
माफ करना की आज अश्क जो आँखों से बह आये |
यादें तेरी तो दिल में, हर पल रहती हैं,
जब सुनो तुम साथ हो, सांसें ये कहती है |
गुजारिश यह है की ना हों यादें जुदा खुदा,
महकती डाली तेज हवा ना सहती है ||
जो फूल डालिओं से ना गिरें ऐसे फूल हम साँसों में बसाएं,
माफ करना की आज अश्क जो आँखों से बह आये |



© Viney Pushkarna

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