Kaisa Imtehaan


पंडित आज है  ख़ामोश मगर अलफ़ाज़ बोलेंगे, कैसे रोक बैठें है तूफ़ान  आज राज खोलेंगे |
किए वादों को निभाते साँसों में आस घोलेंगे, याद रखेगा हर इंसान प्यार को ऐसे हमारे जज्बात मोह्लेंगे ||

पंडित चला आज कलम जान की, जो हुआ बताने मैं चला,
मिलते हैं चंद सच्चे रिश्ते, उन रिश्तों से मिलाने मैं चला |
यारो जरा संभाल दिल चलना , है रास्ता कुछ तन्हा सा,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना ||

है जान दिया नाम मैंने किसी अपने को है रिश्ता प्यार का,
किया कई सालों से इकरार, बड़ा लंबा अरसा था इंतज़ार का |
एक अरसे बाद मिले, जो हुआ इज़हार प्यार का,
न जाने कैसे क्या हुआ और हो गया मुरीद यार का ||
चंद पलों में सालों का फांसला मिट गया, हुआ जो वादा इकरार का.
एक मीठी सी मुस्कान मिल गई, जिसमे बसा चेहरा है जान का |||
हुई कैसे पलों में सांझी, कैसे हुआ सांसों का तार बताना,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना ||||

कोशिश थी की, कि लबों पर मुस्कान रहेगी,
मुहं में दुआ और दिल में सदा जान रहेगी |
हुआ  तो ऐसा ही है खुद से खुदी सरेंजाम रहेगी,
वो दिल में है चाहे न ये साँसें तमाम रहेंगी ||

कियों जिससे किया इतना प्यार, पड़ा  उसी से दूर जाना,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना |||

एक  दिन हमने झुका सर किसी के चरणों में रख दिया,
ये वोही शीश था जो कभी न था इंसान के आगे झुकने दिया |
लब खामोश कर लिए हैं हमने पर न नाम था उनका लिया,
आज फक्र से कहता हूँ नहीं पंडित ने नाम बदनाम उनका किया ||
न जाने कियो कहाँ किसी ने मुसकान हमारी को गुलाम कर लिया,
हम तो बैठे थे मुकाम को सरेंजाम देने, और उन्होंने हमे ही कुर्बान कर दिया |||

न जाने क्या थी मजबूरी जो मुनाफिज़ समझा न बता पाना,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना |||

हर  रिश्ते को दिल से लगा कर रखा हमने हर बात को पैगाम किया,
वो भी  जानते है हमें, है हमने कितना उनसे है प्यार किया |
उनकी ख़ुशी को पंडित आज मैंने खुद को गुमनाम किया,
मेरी जान है मेरा जहां है ऐलान शरे आम किया ||
दूर हो कर भी न भुलाया उन्हें जिस्म को बेजान किया,
घुट घुट कर भी जानेगा ज़माना है कैसे है सांस लिया |||

कुछ बंधन ऐसे होते हैं पंडित जो शायद समझेगा नहीं ज़माना,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना |||

एक  दिन जब देखे हाथ खाली जो हमने सपने में,
वो दिन भी देखे जो बिन बताए रखने हैं |
कातिल हा हा हा हा हा, कातिल कहें पंडित देख तोड़े तेरे अपने हैं,
वो क्या जाने पंडित तुने कियों ये सब छिपा कर रखने है ||
पीठ पर वार कर याँ झूठ बोल पंडित नहीं मार सकने हैं,
खुदा  उनकी नज़रों से न नीचे गिराए, बाकि क्या कोई हमे मार सकते हैं |||

लगा लिया ज़ोर तीन बार, छुपकर हम पर हथियार चलाना,
जिस मोड़ से गुजरी है जिंदगी, है ये कैसा इम्तेहान बताना |||

आज  हारा नहीं पंडित ज़माने से, बस दर्द है तो दूर जाने से,
दिन दिन कम होगीं, शायद साँसे,पर अच्छा है किसी का यादों में साथ पाने में |



© Viney Pushkarna
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