Prathna

Prathna

जिंदगी की राह बेचिदी थी किसी अपने ने कंकर उठा लिए,
जब पंडित फस था एक जाल में तो जाल के तार गिरा  दिए ।
मैं कर्ज़दार हूँ उस मुस्कान का जिसने गम बुला दिए,
आप पूछते हो क्यों कैसे, बस शिवा ने गम मिटा दिए ।।

आज खुद पर विश्वास करते हैं, जो मालिक के चरण दिखा दिए,
रिश्तों से जो दूर हो गए, आज वापिस खुदा दिला दिए ।
महसूस करता हूँ आज जिंदगी, जिसने जीने के पल थे बुला दिए,
बहुत दूर हूँ मैं यहाँ पर,खुदा ने हाथ थमा  दिए ।।

एक दिन खुदा ने एक काम कर, हमे राह बतला दिए,
खुद को आज खड़ा करो, ये लफ्ज़ खुदा ने सुना दिए ।
मैं चल पड़ा हूँ कुछ बन्ने की ओर, दोनों हाथ शिव चरणों लगा दिए,
यह मुस्कान एक अनोखी , जिसने कदम आगे बड़ा दिए ।।

एक फ़रियाद शिवा से मेरी, मेरी बहिन को आइनेखना दिलादिजिये,
वो जब वहां खुश होगी,उसकी मुस्कान से ताकत बड़ा दीजिये ।
मैं पंडित जो महसूस करता हूँ, मेरे लफ़्ज़ों को फैला दीजिये,
बस इस दुनिया में से दर्द, झूठ, लाचार्पण मिटा दीजिये ।।

वो  बोलते हैं संग जाना न कुछ, मुझे मेरी मौत पर खुशियाँ दिल दीजिये,
अभी समय है चाहे बड़ा पर, जो मरूं  तो दुनिया को हँसा दीजिये ।
खवाहिशें तो इस दामन बहुत, इस दामन को चरणी लगा लीजिये,
एक दुआ इस जग के लिए, इस जग को गुलिस्तान बना दीजिये ।।

आज खुदा उस शख्स को भी, उसके गुनाहों से मुक्त करा दीजिये,
हमारे दिल से मिटाया जैसे, हमे उसकी जिंदगी से मिटा दीजिये ।
हमे नहीं रखना बैर किसी से, इस जिंदगी को प्रेम सिखा दीजिये,
हम तो ठोकर खा देख चुके, पर किसी और को न यह ठोकर लगा दीजिये ।।

हम माँ बाप के बेटे छोटे, हमे जिंदगी में कुछ बना दीजिये,
जो जो हुई अनजाने से खता, हमे उसके ताप से बचा लीजिये ।
भाई के चरणों में रहें सदा, हमे भाई का साथ दिल दीजिये,
एक और खवाहिश है हमारी, हमे एक भान्जी जल्दी से दिल दीजिये ।।

जिन आँखों से गिरे मोती इस नजीज़ के लिए, उन आँखों को रौशन करा दीजिये,
जो धोखा कर गए हमसे, उनको भी पार लगा दीजिये ।
आज दिल खोल कर मैं सब भूलता हूँ, बस भुलाने की शक्ति दिल दीजिये,
जब कभी मिले उनसे हम, देख उनकी ख़ुशी हमे भी हँसा दीजिये ।।

इस कलम से लिखू जब भी, हाथ मेरे हों आप लिखा दीजिये,
मैं तो यूं ही हाथ चलाऊं, आप इन्हें लफ्ज़ बना दीजिये ।
चलते हुए इस जग में जब , कभी कोई समझें न बातें,
आप खुद बन वक्ता, इस धार को समुंदर बना दीजिये ।।

आपके साथ से मैं तो लिखता जाऊँगा, आप मेरे अवगुण मिटा दीजिये,
चलते चलते किसी मौड़ पर, हमे भी दर्शन करा दीजिये ।
आज करते है आवाहन आपका, इस कविता को विराम लगा दीजिये,
इस पंडित की बैठ जुबान पर, सारा जहाँ महका दीजिये ।।


© Viney Pushkarna
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