स्त्री - एक सत्य

उठाली फिर कलम पंडित लिखने को,
घिंनोनि तस्वीर समाज की दिखानी है,
बाहर से दिखने वाला हर सफेद चौला,
अंदर से कितना काला और खाली है।

बालक की चाहत में जीवन न बुला दो,
नारी का सन्मान और विरासत न गवा दो।
पुत्री बिना....
इस संसार की कल्पना करके तो देखो,
मौत से बदतर लगेगा जीवन,
कहना अगर आंसू न बहा दो।

घोर अंधकार में ज्योति है नारी,
हृदय प्रेम, विनम्र संस्कार की क्यारी,
समाज की है भव्य यह माँ शक्ति,
जिस घर आए वो हो जाता आभारी।
तनिक सोच विचार कर देखो,
शत्रु कौन किसका, कौन जा रहा है मारी,
पुरुषों से अधिक आज इस जीवन मे,
नारी ही नारी के लिए, बनती जा रही कटारी।

शुक्र है मेरे घर बेटी नही है,
जो मांगो सृष्टि देती नही है,
कहीं बेटी दामन दाग न लगा दे,
हो बेटा तो मेरा वंश चला दे।
ऐसे ताने दुनिया देती रही है,
पर सृष्टि में पुत्री जन्म लेती रही है।
सन्मान बढा देती है पिता का,
इस लिए हर पिता की चहेती रही है।
मां की सखी बन हर दुख हर लेती रही है,
भाई को संस्कार प्रेम सदा देती रही है।
घिर जाते हैं हम कभी नज़रों से अपनी,
थाम हाथ आंसू सब पोंच लेती यही है।

करता सवाल मैं अक्सर खुदी से यह,
बेटियां बेटों की जगह क्यों लेती नही है।
संस्कार बेटों के,..
बेटियों के क्यों नही हैं,
पुत्र जन्म पर खुशियां और मिठाइयां,
पुत्री जन्म पर मिठाई क्यों देते नही हैं।

बदल संस्कार गए हैं सबके,
क्योकि वैदिक आधार नही है।
क्यो समाज चाहता सुशील बहुएं,
जब घर मे बेटी ही स्वीकार नही है।
दूसरों की बेटियों में निकालते जो कमियां,
उनके जीवन का आधार नही है।
बहुएं भी बन जातीं हैं बेटियां,
पर क्यो बहु सास में प्यार नही है।

धारावाहिक , चलचित्रों ने
छवि सास बहू की बिगाड रखी है,
मेरी माने मेरा चले,
अंहकार श्रींखिला, खिलवाड़ घड़ी है।
भूल जाते हैं अपनाना जब,
तब से ही तकरार पड़ी है।
विनम्रता क्षमा संस्कारों में जो हो,
तो देखो प्रेम भरी बौशार पड़ी है।

पुरुष जो नारी सन्मान न करे,
बहन से प्रेम माँ को प्रणाम न करे,
उस पुरुष को जननी दिखा देना,
कुरहारती मां की चीखें सुना देना।
रूह कांप जाएगी खड़े होंगे रौंगटे,
तब आंखों से रिस्ते अश्कों को देख,
हे माँ आँचल से पौंछ चुप करा देना।